प्रेमचंद का साहित्य एवं जनमानस पर प्रभाव विषयक संगोष्ठी का आयोजन
प्रेमचंद के पात्र हमारे आस पास निवास करते हैंसर्वेश कुमार सिंह5अगस्त 2026को उत्तर प्रदेश भाषा संस्थान एवं
नवयुग कन्या महाविद्यालय राजेन्द्र नगर के हिंदी विभाग की नवज्योतिका संस्था के संयुक्त तत्वावधान में कथा सम्राट मुंशी प्रेमचंद की जयंती के अवसर पर एक दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी भाषा संस्थान के निदेशक सर्वेश कुमार सिंह के निर्देशन में आयोजित की गई। संगोष्ठी का मुख्य विषय था
“प्रेमचंद का साहित्य एवं जनमानस पर प्रभाव “।
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कार्यक्रम की अध्यक्षता महाविद्यालय की प्राचार्या प्रो मंजुला उपाध्याय ने की । इस अवसर पर भाषा संस्थान के निदेशक श्री सर्वेश कुमार सिंह उपस्थित रहें।
कार्यक्रम का प्रारंभ दीप प्रज्वलन एवं सरस्वती वंदना से हुआ।
अतिथियों का स्वागत पौध,अंग वस्त्र और स्मृति चिन्ह भेंट कर किया गया।
मुख्य वक्ता प्रो ०राहुल पांडे ने कहा ,”मुंशी प्रेमचंद का साहित्य भारतीय समाज का सजीव चित्र प्रस्तुत करता है। उन्होंने अपने उपन्यासों, कहानियों और निबंधों के माध्यम से समाज की वास्तविक समस्याओं को उजागर किया तथा जनमानस को जागरूक करने का कार्य किया। उनके साहित्य का समाज पर गहरा और स्थायी प्रभाव पड़ा है।”
विशिष्ट वक्ता प्रो माधुरी यादव ने कहा ,”प्रेमचंद का साहित्य केवल अपने समय का दस्तावेज़ नहीं है, बल्कि आज भी उतना ही प्रासंगिक है। उन्होंने साहित्य को समाज सुधार का प्रभावी माध्यम बनाया और मानवता, समानता तथा न्याय के आदर्शों को स्थापित किया। इसलिए उन्हें “उपन्यास सम्राट” ही नहीं, बल्कि भारतीय समाज के संवेदनशील चिंतक और जन-जागरण के अग्रदूत के रूप में भी स्मरण किया जाता है। डॉ अपूर्वा अवस्थी ने विचार व्यक्त करते हुए कहा कि “प्रेमचंद समाज के लेखक थे, उसी के अनुरूप उन्होंने सरल, सहज और प्रभावशाली भाषा का प्रयोग किया।उनकी प्रमुख कृतियों में गोदान, गबन, निर्मला, कर्मभूमि, रंगभूमि तथा प्रसिद्ध कहानियों में कफ़न, ईदगाह, पूस की रात प्रमुख हैं। ये सभी समाज का आईना दिखाती हैं। इसीलिये
उनका साहित्य आज भी सामाजिक चेतना, मानवीय मूल्यों और यथार्थवादी दृष्टि के कारण अत्यंत प्रासंगिक माना जाता है।”कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रही
प्राचार्या प्रो मंजुला उपाध्याय ने कहा ,”
प्रेमचंद का साहित्य स्वतंत्रता आंदोलन के समय लोगों में देशभक्ति, आत्मसम्मान और सामाजिक जिम्मेदारी की भावना जगाने में सहायक बना। उन्होंने साहित्य को केवल मनोरंजन का माध्यम न मानकर सामाजिक परिवर्तन का सशक्त साधन बनाया। उनके कारण हिंदी साहित्य में यथार्थवाद को नई दिशा मिली।
उत्तर प्रदेश भाषा संस्थान के निदेशक सर्वेश कुमार सिंह ने कहा कि,” मुंशी प्रेमचंद का साहित्य सार्वकालिक हैं। उनकी कहानियां पढ़ते हुए यह लगता हैं कि ये पात्र हमारे आस पास निवास करते हैं और घटनाएं हमारे जीवन से जुड़ी हुई सी लगती हैं। उनका साहित्य यथार्थ की पृष्ठभूमि पर आदर्श को प्रस्थापित करता है, यही उनकी रचनात्मकता की खूबी है”। कार्यक्रम संयोजक डॉ रश्मि शील ने कहा कि” प्रेमचंद जी ने प्रगतिशील लेखक संघ के पहले अधिवेशन में कहा था कि अब नए तरह के साहित्य को लिखने की आवश्यकता है। मगर वे बहुत पहले से साहित्य के फलक पर नए रंग भर रहे थे। उन्होंने साहित्य को कल्पना के आकाश से धरातल पर उतारा और उसे जीवन मूल्यों से जोड़ा। इसीलिए उनका साहित्य जन मानस को प्रभावित करने में समर्थ हैं।”
इस अवसर पर हिंदी विभाग एवं प्रयोजन मूलक हिंदी की छात्राओं खुशी निषाद, रैना अवस्थी, मंजू कुमारी, श्वेता कश्यप, गरिमा कश्यप
ने प्रेमचंद के संस्मरण और बूढ़ी काकी कहानी का सुंदर वाचन किया। कार्यक्रम का सफल संचालन डा अंकिता पांडे ने किया ।इस अवसर महाविद्यालय की सभी छात्राएं और प्रवक्ताएं उपस्थित रहीं।
